YUDHISTHIR KA PASCHATAP युधिष्ठिर का पाश्चाताप A RILIGIOUS STORY

लोक कथाओं में चर्चित यह कहानी महाभारत काल से संबंध रखती है । जिस क्षेत्र में युद्ध हुआ था, उस क्षेत्र की धरती रक्तपात से लाल हो चुकी थी । पांडवों को जीत तो मिली लेकिन उनको जीत  की खुशी रास नहीं आई  । उनका मानना था कि हम युद्ध जीत कर भी हार गये है । अपने हाथों किए गये  इस जघन्य पाप से मुक्ति मार्ग चाहते थे ।                                                                               एक  दिन युधिष्ठिर अपने कक्ष में बैठे गहन सोच में डूबे हुए थे ।  उन्होंने सोचा हम लोग सब कुछ जीत कर भी सब कुछ  हार गए ।आखिर हमारे जीने का  उद्देश्य क्या शेेष रहा । इस नश्वर शरीर और कृत्रिम धन के लिए हमने अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया ।   आत्मग्लानि से सराबोर होकर उन्होंने अपने आप को सोच केेे गहरे समुद्र डाल लिया था। उन्हें दुर्योधन के साथ बिताए हुए पल की याद आ रही थी । हम सभी भाईयों में कितना परस्पर प्रेम था । हर कोई एक दूसरे को खुश रखने का प्रयास करता था ।                              मैं अपने भाइयों से ज्यादा दुर्योधन से प्यार करता था । उसकी हर जिद को मैं  सहज भाव से पूरा कर देता था । मुझे आज भी याद है भीम से झगड़ा करने के बाद मेेेरे यहां आकर उसके शिकायत करने का अंदाज कितना प्यारा होता था । इस नश्वर धन सम्पत्ति और राज पाट के लिए हमने अपने सर ये कैसा पाप ले लिया । लोग हमें  धर्मराज के नाम से जानते हैं । क्या धर्मराज का यही कर्तव्य होता है ? कि एक प्रिय वस्तु को पाने के लिए अपने ही प्रिय जनों को खोना पड़े । इसी उधेड़बुन में उलझे महाराज युधिष्ठिर का मन आत्मग्लानि  के बोझ से दबता चला जा रहा  था ।                                       उन्हें यह  आभास नहीं हुआ कि भगवान श्री कृष्ण आगमन हो चुका है ।  भगवान श्री कृष्ण तो अंतर्यामी है । वे युधिष्ठिर के  मनोदशा  को देखते ही भांप लिए कि माजरा क्या है ? फिर भी उन्होंने बहाना बनाते हुए पूूूछ ही लिया  ।"कैसे हो तात ? क्या सोच रहे हैं, बड़ी गंभीर मुद्रा मे दिखाई  दे रहे हैं ? भगवान श्री कृष्ण के ऐसा कहने पर युधिष्ठिर ने कहा " आप तो अंतर्यामी    है प्रभु ,जाने अंजाने में मेेेेरे और मेेेरे भाईयों से  यह क्या गलती हो गई,  मैं अपने से ही अपने आप को दोषी पा  रहा  हूं । हम सभी भाईयों को अपने ही भाईयों के खून से हाथ रगना पड़ा ।इस पाप के बोझ से मेरा मन दबते चला जा रहा है । मैं जितना भुलने की कोशिश करता हूं । यह उतना ही मेरेेे मन मस्तिष्क हलचल मचाए हुए हैं ।                                         कृृृपा करके हे तात श्रेष्ठ  । आप ही कोई मार्ग निकाले जिससे हमारे उद्विग्न मन को  शांति मिल सके ? काफी अनुनय विनय के बाद भक्तवत्सल  भगवान श्री कृष्ण मुस्कुराए और बोले " हे तात इस के लिए मैं आपको एक उत्तम मार्ग बताता हूं । भगवान शिव जी जो देेेवो के देव  महादेव हैं । उनके अलावा किसी केेे अंदर  इतनी क्षमता नहीं है कि  ऐसे पाप संताप सेेे मुक्ति दिला सके । आप सभी भाई चंद्रशेखर भगवान सदाशिव की शरण में जाइए वही इस संताप से आप सबको मुक्ति दिला सकते हैं । उनसे बड़ा क्षमावान और हर कार्य को सिद्ध करने की क्षमता और किसी भी देव, दानव, ऋषि, महर्षि आदि मे नहीं है । वो सर्वेश्वर भगवान सदाशिव आप लोगों का कल्याण अवश्य करेंगे । रेवा नदी के तट पर नंदीकेश्वर नामक एक तीर्थ स्थान है । वह क्षेत्र  भगवान शिव को काशी केे समान अत्यंत प्रिय है ।                                          कालांतर मे एक ब्राम्हण परिवार रहता था । ब्राम्हण  बड़ा ही ज्ञानी और सिद्ध पुरुष था । जब वह वृद्ध हो गया तो अपने जेष्ठ पुत्र को बुलाकर कहा " मैं कुछ दिन काशी मे वास करना चाहता हूं । आज से घर की सारी जिम्मेदारी मैं तुमको  सौपता हूं । "और वे काशी मैं निवास करने चले गए । कुछ समय बाद उनकी पत्नी की भी मृत्यु हो गई ।  उनका जेष्ठ पुत्र मां की अस्थि लेकर काशी के लिए निकल पड़ा। रास्ते में कुछ ऐसी घटना हुई जिसकी वजह से भगवान शिव के अनुपम मंदिर नंदीकेश्वर जाना पड़ा ।उसने अपने मां की अस्थियों को वही विसर्जित कर दिया । तब से वह स्थान एक महान तीर्थ के रूप  मे परिवर्तित हो गया । आप सभी भाईयों को भगवान सदाशिव के शरण मे  जाकर क्षमा के लिए प्रार्थना करना होगा ।                         उस समय युधिष्ठिर अपने सब भाइयों के साथ भगवान नंदीकेश्वर के उस अनुपम तीर्थ के दर्शन के लिए पहुंचे । वहां जाकर सब भाइयों ने घोर तपस्या कर कर भगवान शिव को प्रसन्न किया और अपने महापाप से मुक्त हुए ।                 दोस्तों यह कहानी आप को कैसी लगी  कमेंट बॉक्स मे दो शब्द जरूर लिखें और अपने दोस्तों को शेयर करें धन्यवाद । लेखक- भरत गोस्वामी ।

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